रंगीलो राजस्थान (स्थापना दिवस पर विशेष)

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राजस्थान की संस्कृति अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। दुश्मन को भी आश्रय देने तथा अतिथि को भगवान मानकर सेवा-सत्कार करने की परम्परा आज भी यहाँ जीवन्त रुप में देखी जा सकती है। ‘पधारो म्हारै देश’- हर राजस्थानी के दिल की आवाज है।

राजस्थान की संस्कृति धर्म-व्रत-त्याहारों और अनेक रीति-रिवाजों से सुसम्पन्न दिखायी देती है। होली, दिवाली, रक्षाबन्धन, तीज, गणगौर, शीतलाष्टमी, रामनवमी, गोगा
नवमी, जन्माष्टमी, महावीर जयंती आदि के अलावा यहाँ क्षेत्रीय पर्व भी बङी धूमधाम व उमंग के साथ मनाये जाते हैं और यहाँ के मेले तो दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। तीर्थराज पुष्कर, महावीरजी, कल्याणजी, कैलादेवी, खाटूश्यामजी, जीणमाता, मेंहदीपुर बालाजी, बेणेश्वर कुंभ, अजमेर दरगाह, सालासर बालाजी, करणीमाता, रामदेवरा, कपिलमुनि, तीज, गणगौर, सुन्धामाता, भृर्तहरि, राणीसती आदि मेले आपसी भाईचारे, सौहाद्र एवं धार्मिक आस्था के परिचायक हैं। मेले का मतलब है- ‘दिलों का मेल’। इन मेलों में विभिन्न क्षेत्रों से आये हुए लोग आपस में मिलते हैं तथा अपनी भावनाओं का आदान-प्रदान करते हैं, जिससे उनमें मेल-मिलाप व घनिष्ठता बढती है।

राजस्थान के लोकगीत मात्र मनोरंजन के साधन ही नहीं, बल्कि यहाँ की संस्कृति व परम्पराओं के सच्चे पहरेदार भी हैं। यहाँ अलग-अलग अवसरों पर विभिन्न प्रकार के गीत गाये जाते हैं। जैसे शिशु के जन्म संबंधी गीतों में होलर, घूघरी, अजवायन, सूंठ, जच्चा, पीला, बेहमाता तथा जळवा, विवाह-गीतों में बनङा-बनङी, कांकण-डोर, विनायक, मायरा, सियाला, जंवाई, कामण, सींठणा, बान, हल्दी तथा टोरडी, मृत्यु-संस्कार के गीतों में छेङे तथा हरजस, त्यौहार-पर्वों पर होली, तीज, गणगौर, दशहरा तथा गोगा नवमी, कृषक-गीतों में तेजा, लावणी, हेली तथा बारिया, धार्मिक गीतों में रामदेवजी, भैरुँजी, गोगाजी, पाबूजी, हरबूजी, महावीरजी, बालाजी, केसरियाजी,
देवनारायणजी, भोम्याजी, करणीमात, आवङमाता, जीणमाता, कालीमाता, शीतलामाता तथा सैंसणमाता के गीत, पतिव्रत-धर्म से जुङे गीतों में भीलणी, सुप्यार दे, जसमल, सजना जतणी, सत्यवान-सावित्री, बेना बाई, निहालदे तथा अनुसूया के गीत, विरह गीतों में कुरजां, ओळ्यूं, हिचकी, पपैयो तथा सुपणो, प्रेम-गीतों में ढोलामारू, मूमल, हींडो, रसिया आदि, अन्य गीतों में बीछूङो, मोरियो, कलाली, पणिहारी, पीपली, बालम छोटो सो, डूंगजी-जवाहरजी के गीत, फाग, लूर, चिरमी, सूवटियो, कागा, इंडोणी, गोरबन्द, घूमर, कांगसियो, जीरो आदि गीत प्रमुखता से गाये जाते हैं, जिनमें इस प्रदेश की परम्पराओं व रीति-रिवाजों का सुन्दर वर्णन मिलता है।

गीत-संगीत के साथ-साथ लोकनृत्य तथा खेल-तमाशे भी राजस्थान की संस्कृति में रचे-बसे हैं। शंकरिया, पणिहारी, गैर, घूमर, गींदङ, चकरी, कालबेलिया, भवाई, चरी आदि यहाँ के प्रसिद्ध नृत्य हैं। इसके अतिरिक्त ख्याल, रम्मत, नौटंकी, भांड, सपेरे, मदारी, जादूगर, नट तथा कठपूतली भी मनोरंजन के प्रचलित साधन हैँ।

राजस्थान की वेशभूषा सबसे अनूठी व निराली है। यहाँ पुरुषों में पगङी बाँधने का विशेष रिवाज है। भिन्न-भिन्न अवसरों पर विभिन्न प्रकार की पगङियाँ बांधी जाती हैं, जैसे- श्रावण में लहरिये की पगङी, विवाह तथा युद्ध के समय केसरिया पगङी, रक्षाबंधन पर मोठङे की पगङी तथा मृत्यु के अवसर पर सफेद पगङी विशेष रूप से बांधी जाती है। पुरुष-समुदाय के वस्त्रों में जामा, अंगरखी, चोगा, धोती, कुर्ता-पजामा व पगङी तथा महिला-समुदाय के परिधानों में विभिन्न भांतों की ओढनियाँ, पोमचा, चूनङी, नानङा, घाघरा, कुर्ती, कांचली तथा धोती प्रमुख है। यहाँ अवसर, आयु तथा जाति के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के वस्त्र पहनने की परम्परा है।

राजस्थान में मुख्य रूप से हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, जैन तथा बौद्ध धर्मावलम्बी रहते है। साथ ही यहाँ कई सम्प्रदाय-उप सम्प्रदाय भी हैं, जिनमें निम्बार्क, वल्लभ, गौङीय, रामानन्दी, निरंजनी, लालदासी, नाथ, अलख, नवल, परनामी तथा चिश्ती सम्प्रदाय को प्रमुखता से लिया जा सकता है। सम्प्रदाय चाहे जितने हो, सबका उद्देश्य समाज-सुधार व मानव- कल्याण है। सभी मतों के लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं और हर्षोल्लास के साथ अपने-अपने उत्सव-पर्व मनाते हैं।

राजस्थान में लोक-कथाओं की परम्परा अत्यन्त समृद्ध रही है। प्राचीनकाल से ही यहाँ की दादी-नानी अपने बच्चों को कहानियाँ सुनाती आयी हैं। राजस्थान में कहानी को ‘बात’ कहा जाता है। यह परम्परा आज भी यहाँ उतनी ही समृद्ध है। इन बातों का मकसद मात्र मनोरंजन ही नहीं, बल्कि बालकों को नीति-व्यवहार व संस्कार सीखाना भी है। यहाँ कई प्रकार की बातें कही जाती हैं, यथा- वीरभावात्मक बातें, धर्म सम्बम्धी बातें, पौराणिक बातें, इतिहास की बातें, चातुर्य सम्बम्धी बातें, प्रेम-विषयक बातें, नीतिपरक बातें, व्यवहार कुशलता सम्बम्धी बातें, जासूसी सम्बम्धी बातें, पशु-पक्षियों की बातें,चोर-धाङेतियों की बातें आदि-आदि। सभी बातें कोई न कोई सीख अवश्य देती हैं।

यहाँ की शगुन परम्परा भी खासी प्रचलित है। अनुभवी लोग हवा, बरसात, दिशा, पशु-पक्षी, अंग फङकने, घास, जल, दूब, कलश, संन्यासी तथा अनेक अन्य स्त्रोतों से शगुन लेते हैं। और मजे की बात तो यह है कि आधुनिक वैज्ञानिकों की नजर में अंधविश्वास लगने वाले ये शगुन अपनी-अपनी कसौटी पर खरे उतरते हैं।

ऐसी वीरों को पैदा करने वाली, रेतीले धोरों वाली, भोले-भाले किसानों वाली, सरल-व्यवहार तथा निष्कपट लोगों से आबाद, मेहनतकश मजदूरों वाली, हरे-भरे खेतों वाली, सब पर स्नेह लुटाने वाली, देवी-देवताओं की क्रीङास्थली राजस्थान की पावन धरा को कोटि-कोटि नमन!

द्वाराः मेघराज रोहलण ‘मुंशी’

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लालच की उम्र (कहानी)

विधि के विधान से मनुष्य, गधे, कुते और गिद्ध को बीस-बीस वर्ष की आयु प्राप्त हुई। बाकी तीनों प्राणियों को तो संतोष हो गया, परन्तु लालची मानव का मन न भरा। जैसे ही उसने उन्नीस वर्ष की आयु पूर्ण की, वह चिन्तित हो उठा। मात्र एक बरस की जिन्दगी और बची थी उसके पास! दिन का चैन और रातों की नींद हराम हो गई। सोचने लगा, “अभी तो मैंने कुछ नहीं किया इस दुनिया में आकर। सारे काम अधूरे पङे हैं। और यह मौत बैरन बस आयी ही चाहती है। अब क्या होगा?”

कई दिनों तक वह सोचता रहा कि कैसे इस मुसीबत को टाला जाये। यहाँ तक कि सोचते-सोचते यूँ ही दिन बीत जाता, परन्तु कोई उपाय न सूझता। आखिर एक दिन उसने निश्चय किया कि किसी भी तरह थोङी और आयु प्राप्त की जाये।
“लेकिन कैसे?”- एक नया सवाल खङा हो गया।
“अरे! यह भी कोई बात हुई? वह मनुष्य है! विधाता ने उसे बुद्धि दी है! कैसे भी करेगा!”- तुरन्त जवाब भी मिल गया।
उसने फिर दसों दिशाओं में अपने दिमाग के घोङे दौङा दिये।

घोङे बङे कामचोर निकले। न जाने कहाँ जाकर सो गये। आज दस दिन हो गये, लेकिन अभी तक मानव भाई की सुध तक नहीं ली कमबख़्तों ने।

आखिर ग्यारहवें दिन एक घोङे ने न जाने कैसे कृपा की कि वह चला आया। काफी प्रसन्न दिखायी दे रहा था। ज़रूर कोई समाधान खोजकर लाया था वह।
आते ही मानव भाई ने बेसब्री से पूछा, “लाये हो कुछ?”
घोङा बोला, “अजी कुछ क्या, सब-कुछ उठा लाया हूँ! अभी सुनोगे तो बाछें खिल उठेंगी।”
“तो सुना डालिए न! देर किस बात की!”
मानव भाई की उतावली देखकर घोङे ने विस्तार से अपनी रिपोर्ट पेश की।
घोङे की रिपोर्ट सुनकर मानव भाई ऐसा खुश हुआ मानो उसे कुबेर का खजाना मिल गया हो। वह तुरन्त घर से निकल पङा।

सतयुग का जमाना था। कहते हैं उस जमाने में पशु-पक्षी भी इंसान की तरह बोलते थे। मानव भाई शुभ शकुन लेकर घर से निकला था सो जाते ही उसे एक चरागाह में घास चरता हुआ उसका हमउम्र दोस्त गधा मिल गया। वह बङा खुश हुआ। पास जाकर बोला- “जै रामजी की गर्दभ भाई!”
“जै रामजी की..जै रामजी की…मनुआ भाई! कहो, आज कैसे कृपा की?”- गधे ने चरने का काम जारी रखते हुए पूछा।
“क्या करूँ भाई, काम ही ऐसा आन पङा कि न चाहते हुए भी आना पङा!”- मानव भाई ने एक पेङ की छाया में बैठते हुए जवाब दिया।
“ऐसा कौनसा काम आन पङा भाई?”- गधे ने तनिक गर्दन उठाकर पूछा।
“पास तो आ यार! बैठकर बात करेंगे!”
गधा मानव भाई के पास आकर बैठ गया।
मौका देख मानव भाई बोला- “यार गर्दभभाई! यह ब्रह्माजी तो ससुरा बङा अन्यायी है रे! उपर से जितना सीधा-सादा दिखता है, अन्दर से उतना ही कुटिल है यह।”
“वह कैसे भाई?”- गर्दभभाई ने असमंजस के भाव से पूछा।
“देखते नहीं, कछुए को तीन सौ वर्ष, मोर को डेढ़ सौ वर्ष और साँप को सौ वर्ष की आयु दे डाली उसने। क्या करेंगे भला ये इतनी उम्र का? और इधर हमें? बाप रे बाप, बीस-बीस वर्ष की आयु देकर झुठला दिया! अब तुम्हीं बताओ, यह हमारे साथ अन्याय है कि नहीं?”
भोला गर्दभ कुछ समझा, कुछ न समझा, पर उसने हामी भर ली। मानव भाई अपनी सफलता पर मन ही मन मुस्कुरा उठा। उसका तीर अचूक साबित हुआ। बोला-“तो चलें ब्रह्माजी के पास?”
“क्यों?”
“और आयु लाने के लिए!”
गर्दभभाई सुबह से भूखा था। अभी चरने के लिए चरागाह में आया ही था कि मानव भाई आ पहुँचा था। इस समय अपने पेट पर संकट आया देख वह बोला- “पर..पर…मेरा पेट..ख..खा…..! ”
“अब यह पर-वर छोङो और चलो जल्दी! क्या तुम जानते हो कि एक वर्ष बाद तुम मरने वाले हो?”
“क..क…क….क्या?”- भौंचक्का रह गया गर्दभभाई।
“हाँ! जल्दी करो, वरना हम यहीं मर जायेंगे।”
गधा पूँछ फटकार कर बोला- “तब तो जल्दी चलो भाई!”
यह सुनकर मानव भाई ऐसा खुश हुआ मानो उसने कोई बहुत बङा मैदान मार लिया हो।
दोनों वहाँ से रवाना हुए। रास्ते में गर्दभभाई पूछने लगा- “पर मनुआ भाई, ये ब्रह्माजी हमें मिलेंगे कहाँ?”
“भाई! ब्रह्माजी की तो बाद में सोचेंगे, पहले हमारे दो हमउम्र दोस्त कुता और गिद्ध तो मिलें!”
“क्या वे भी अपने साथ ही मरेंगे?”- भोला गर्दभ पूछ बैठा।
“क्या तुम भूल गये? ब्रह्माजी ने हम चारों प्राणियों को एक साथ ही बनाया था!”
तभी गर्दभभाई बोला-“वह देखो मनुआ भाई! वह बैठा गिद्धवा भाई…..उस पेङ पर।”
मानव भाई ने देखा, एक ऊँचे पेङ पर गिद्धराज बैठा पंख खुजा रहा था।

एक क्षण में दोनों गिद्ध के पास जा पहुँचे। देखा, पास में एक पशु मरा पङा था। चील, कौआ और कुत्ता उस पर छाए हुए थे। कुत्ते और गिद्ध का एक साथ मिलना मानव भाई के लिए बहुत बङी खुशी की बात थी। वह फूला न समाया। गधे ने भी अपनी खुशी व्यक्त करने के लिए एक मीठा-सा तराना छेङ दिया- “ढेंचू…ढेंचू…ढेंचू…ढेंचू…ढेंचू…ढ़ेंचू…..!”
सभी जानवर चौंक गये।
इसके बाद दोनों एक पेङ के नीचे बैठ गये और ईशारे से गिद्ध को बुलाया। वह पेट भर चुका था, सो तुरन्त उड़कर चला आया। फिर कुत्ते को बुलाया, तो वह अकङकर बोला- “हम नाहीं आते, ससुर बङी मुश्क़िल से मौका मिला है आज!”
कहकर वह पशु की खाल खिंचता हुआ पीछे सरकने लगा।
मानव भाई ने चिरौरी की- “कुत्ते भाई! ज़रा एक बार आओ तो सही! एक मिनट से ज्यादा नहीं रोकूंगा! भगवान-कसम!”
“बोला न बाप, हमें फुर्सत नाहीं!”- कहकर वह मांस नोचने लगा।
मानव भाई को बङा गुस्सा आया।
वह हाथ में छङी लेकर कुत्ते की तरफ लपका। कुत्ते ने हाथ जोङ दिए और गिङगिङाकर बोला- “हं.हं..हं..हं..हं… मानव भाई, काल्हि से हमरा पेट खाली पङा है..!”
मानव भाई उसे हङकाते हुए बोला- “ससुर पेट भरना तो रोज का काम है! लेकिन क्या कभी भरा है आज तक? यह पेट, यह भूख सब यहीं रहेंगे। नहीं रहेंगे तो सिर्फ हम! बहुत कम जिन्दगी बची है अब हमारी। कल को मर जायेंगे हम यूँ ही, समझे?”
मानव भाई की फटकार सुनकर कुत्ता सीधा पेङ के नीचे चला आया।

मानव भाई तीनों प्राणियों को समझाने लगा- “मेरे भाईयों! आपने कभी सोचा भी नहीं होगा कि इस जगत के पालक अर्थात् ब्रह्माजी भी इतने बङे अन्यायी हो सकते हैं कि एक महत्वहीन और तुच्छ प्राणी तो तीन सौ वर्ष की आयु दे दी और हम जैसे बुद्धिमान और मेहनती प्राणियों को मात्र बीस-बीस वर्ष की आयु देकर झुठला दिया। यह हमारे साथ धोखा है, भेदभाव है, घोर अन्याय है, जो सिर्फ हमीं चार प्राणियों के साथ हुआ है। हमारी आयु अब पूरी होने के कगार पर है। हमने अभी कुछ नहीं देखा दुनिया में आकर! कल जन्मे थे, आज बूढ़े हो गये और कल मर जायेंगे। और अब हम कुछ कर भी नहीं सकते, क्योंकि हम चंद दिनों के मेहमान हैं। हमारा जन्म लेना ही निर्रथक रहा। (तेवर बदलकर) लेकिन अब हम लङेंगे इस अन्याय के खिलाफ! मिलकर लङेंगे! और तब तक लङेंगे, जब तक हमें न्याय नहीं मिलेगा, ब्रह्माजी हमें पूरी आयु नहीं देंगे! तो मेरे प्यारे भाईयों! समय बहुत कम बचा है, इसलिए आज ही हम चारों प्राणी ब्रह्माजी के पास चलते हैं!”

मानव भाई के इस वक्तव्य ने तीनों ही प्राणियों पर वशीकरण का काम किया और वे चारों तत्काल वहाँ से रवाना हो गए।
ब्रह्म-मुहुर्त का समय था। ब्रह्माजी स्नान के लिए घर से निकलने ही वाले थे कि चारों प्राणियों ने अचानक किसी देवशक्ति की भाँति प्रकट होकर उनके चरण थाम लिए। इस अप्रत्याशित हरकत से ब्रह्माजी सकते में आ गए। उन्होंने पैर छुङाने की कोशिश की, तो पकङ और मजबूत हो गई। ब्रह्माजी लाख कोशिश करके भी पैर नहीं हिला पाये। उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। वे साहस कर बोले- “कौन हो भाई? मुझे क्यों पकङ लिया सवेरे-सवेरे ही?”
मानव भाई अपनी पकङ मजबूत करते हुए बोला- “हम मृत्युलोक के वे चार प्राणी हैं, जिनके साथ आपने घोर अन्याय किया है।”
“कौन चार प्राणी?”
मानव भाई ने चारों के नाम गिनाये।
ब्रह्माजी कसमसाकर बोले- “पर अन्याय कैसा?”
मानव भाई बोला- “हम जैसे बुद्धिमान और मेहनती प्राणियों को मात्र बीस-बीस वर्ष की अल्पायु देकर झुठलाना अन्याय नहीं तो और क्या है?”
ब्रह्माजी समझाने लगे- “देखो प्यारों! मैंने बहुत सोच-समझकर आपको आयु दी है। मेरी मानो तो आप और आयु न लो, वरना बहुत पछताओगे! अब मेरे पैर छोङो, मुझे ब्रह्म-स्नान में देरी हो रही है!”
यह सुनकर चारों को बहुत बङा धक्का लगा। मानव भाई बोला- “हमें बहलाने-फुसलाने की कोशिश मत करो! समझ लो, आज हम आयु लेकर ही रहेंगे।”
और उन्होंने चौगुनी ताकत से ब्रह्माजी के पैरों को कस लिया।
ब्रह्माजी पीङा से कराह उठे। उनको अपनी जिन्दगी में आज पहली बार ऐसे प्राणियों से साबक़ा पङा था। उन्हें लगा, जैसे उनके पैर टूटने को हैं। वे घबरा उठे। पसीने से लथपथ हो गए। सोचा, कुछ दिए-दिलाए बिना आज खैर नहीं। वे हारकर बोले- “आप जीते, हम हारे! मैं आपको आयु देने के लिए तैयार हूँ….अब मेरे पाँव छोङो!”
मानव भाई अविश्वास के भाव से बोला- “हमें भरोसा नहीं है आप पर! कहीं पाँव छूटते ही आप भाग खङे हों तो?”
ब्रह्माजी ने अपने पुत्र नारद की कसम खाकर कहा-“बिल्कुल नहीं भागूंगा।”
मानव भाई को फिर भी विश्वास नहीं हुआ, बोला- “अपनी ब्रह्माणी की सौगन्ध खाओ!”
ब्रह्माजी ने झट से ब्रह्माणी की सौगन्ध खाकर पाँव छुङाए। कई देर से उनके पैरों का रक्त-प्रवाह रुका हुआ था। पाँव छूटते ही अचानक रक्त का प्रवाह शुरु हुआ तो उन्हें चक्कर आ गया और वे गिरते-गिरते बचे। बोले- “देखो प्यारों! इस समय हमारे उम्र-खजाने में सिर्फ अस्सी वर्ष की आयु शेष है इसलिए आपको बीस-बीस वर्ष की आयु और मिलेगी।”
यह सुनकर मानव भाई बहुत निराश हुआ। बोला- “हम कितनी बङी उम्मीदें लेकर आए थे, लेकिन आपने हमारी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। देकर भी आपने कुछ नहीं दिया! फिर वही बीस वर्ष की आयु! फिर वही अन्याय! देखना, मैं जाते ही ‘ब्रह्माजी का एक और घोर अन्याय’ शीर्षक से एक विशाल ग्रंथ लिखूंगा और पूरे मृत्युलोक में उसका जमकर प्रचार-प्रसार करूँगा!”
ब्रह्माजी धर्मसंकट में पङ गए। सोचा, यह मूर्ख मृत्युलोक में मेरा अपयश फैलायेगा, मुझे बदनाम करेगा, जलील करेगा! अब क्या करुँ?

सहसा ब्रह्माजी को एक उपाय सूझ गया, बोले- “देखो प्यारों! मैं आपको इससे ज्यादा उम्र तो नहीं दे सकता, क्योंकि खजाना अभी खाली है, लेकिन यह जो बीस-बीस वर्ष की आयु मैं आप लोगों को देने जा रहा हूँ इसकी एक विशेषता है कि आप इसे दूसरे प्राणी को दान भी कर सकते हैं।”
“क..क..क…क्या मतलब?”- मानव भाई ने आश्चयर्य से पूछा।
मतलब यह कि अगर आप चारों में से कोई भी अपनी आयु से तंग आ जायेगा अथवा अपनी आयु पूरी करने में असमर्थ हो जाएगा, तो वह मुझे साक्षी देकर अपनी बची हुई आयु आप में से किसी भी एक प्राणी को दान कर सकेगा। उदाहरणार्थ, मान लीजिए गधे ने पच्चीस वर्ष की आयु पूर्ण कर ली तथा अब वह और ज्यादा नहीं जीना चाहता, तो ऐसी स्थिति में वह अपनी बची हुई पन्द्रह वर्ष की आयु आप तीनों प्राणियों में से किसी भी एक प्राणी को दान कर सकता है। इतना ही नहीं, अगर आप प्रकृति के नियमों का पालन करोगे, जीवन में संयम बरतोगे, सबके साथ अच्छा व्यवहार करोगे, तो आपकी आयु बढ भी सकती है। कहो, अब तो खुश हो न?”
मानव भाई को यह फैसला कुछ-कुछ अपने पक्ष में लगा। बोला- “हाँ, अब ठीक है।”
ब्रह्माजी मानव भाई की रग-रग पहचानते थे। वे यह भी जानते थे कि यह सारी आयु अन्ततः मानव ही प्राप्त करेगा और वह तानाशाह बन जायेगा अतः उन्होंने कुछ मर्यादाऐं निश्चित करना जरुरी समझा। बोले- “लेकिन इस दान की जाने वाली उम्र की एक शर्त भी है और वह यह कि इसे आप श्रेष्ठ कर्म करने पर ही भोग सकेंगे। यदि आप बुरे कर्म करेंगे, तो यह आयु आपके किसी काम नहीं आयेगी।”- कहकर ब्रह्माजी ने अपने खजांची को आयु बांटने की आज्ञा दे दी।
खजांची ने तुरन्त आज्ञा का पालन किया और चारों को बीस-बीस वर्ष की आयु दे दी।
आयु ग्रहण कर बाकी तीनों प्राणी तो बहुत खुश हुए लेकिन मानव भाई के चेहरे से असंतोष की छाया नहीं हट सकी। वह ब्रह्माजी से बोला- “आपके खजाने में सचमुच ही आयु नहीं है या हमें यूँ ही बरगला रहे हो?”
ब्रह्माजी मुस्कुराकर बोले- “प्यारे! ब्रह्म कभी झूठा नहीं होता।”
यह सुनकर मानव भाई खिसिया गया।

“अच्छा, तो अब आप लोगों का काम हो चुका है…कृपा करके यहाँ से जाइए…मुझे ब्रह्म-स्नान में देरी हो रही है!”- कहकर ब्रह्माजी उठे और स्नान करने चल दिए। यह देख चारों ने अपनी राह ली।

रास्ते में बातों का पिटारा खुल गया। मानव भाई सब पर रौब जमाते हुए कहने लगा- “मूर्खों! अगर मैं नहीं होता तो बीस वर्ष तो क्या, कोई तुम्हें एक दिन की भी आयु नहीं देता!”
“अरे! काहे को घमण्ड करते हो मनुआ भाई! अगर मैं सबसे पहले तुम्हारे साथ नहीं होता तो क्या तुम आते?”- कहकर गर्दभभाई मारे खुशी के चारों पैरों पर उछला और ऊँचा मुँह करके गा उठा- “ढें..चू…ढें.चू…ढेंचू…ढेंचू….ढेंचू….ढेंचू…..ढेंचू………..!”
गर्दभभाई ने जब कई देर तक अपना सुर नहीं तोङा तो मानव भाई का धैर्य जवाब दे गया और उसने गर्दभभाई के मुँह पर एक जोरदार मुक्का जङ दिया। तभी कुत्ता बोला- “ससुरे! ऐह भी कोई गाना भया? हमसे ज्यादा तो ज्यादा तो जीवेला नाहीं, काहे को ढेंचू ढेंचू बक रहेवा है?”
मानव भाई अभिमानपूर्वक बोला- “ब्रह्माजी से आयु प्राप्त करने का विचार सबसे पहले मेरे दिमाग में आया। क्या आप तीनों में से किसी एक ने भी सोचा था कभी इस बारे में? सोचोगे कहाँ से? सोचने के लिए दिमाग चाहिए.. दिमाग! अगर तुम्हारे पास दिमाग ही होता तो यह बात मुझसे पहले आप न सोचते।”
गिद्ध भाई ने प्रतिवाद किया- “वह सब तो ठीक है मानव भाई, पर क्या इस कार्य में हमारा बिल्कुल भी योगदान नहीं रहा?”
वाह रे घमण्ड वाह! जब लट्ठ लेकर पीछे पङा तो सब मुँह लटकाकर चले आये। और अब आयु मिलते ही फिर मुँह लटकाकर चल दिए। इसे ही कहते हो तुम योगदान? यही है तुम्हारा……………!”
“बप्पा रे… तुम सब बङा और हम छोटा! अब ऐह लङाई-झगङा भी बन्द करेवा कि नाहीं?”- कुत्ता बीच में ही बोल पङा।

इसी तरह हँसते-गाते, उछलते-कूदते, लङते-झगङते, दौङते-भागते चारों घर पहुँचे।

क्षुधा से व्याकुल कुत्ता जब उस मृत पशु के पास पहुँचा तो उसे घोर निराशा हुई। पशु की हड्डियाँ तक खायी जा चुकी थी। वह भोजन की तलाश में इधर-उधर भटकने लगा। भटकते-भटकते पूरा दिन निकल गया, लेकिन खाने को कुछ नहीं मिला। इधर पेट की अग्नि थी कि बढ़ती ही जा रही थी। मजबूर होकर वह एक घर में घुसा तो दोहरी मार खायी। भूख और पीङा से बेहाल वह रोता हुआ जंगल की तरफ भागा।

दूसरे दिन ईश्वर की कृपा से उसे एक मृत पशु मिल गया। भोजन क्या मिला मानो भगवान मिल गया। दस-पन्द्रह दिन बङे मजे में कटे। लेकिन जैसे ही यह पशु खत्म हुआ, फिर वही पुरानी समस्या पैदा हो गयी। तीन-चार दिन तक वह इधर-उधर भटका, परन्तु कोई फायदा नहीं हुआ। हार मानकर उसे बस्ती की शरण लेनी पङी।
शाम का समय था। कुत्ता भाई एक घर के सामने खङा मौके की तलाश कर रहा था। उसे यहाँ खङे काफी देर हो चुकी थी, लेकिन अभी तक कोई सफलता नहीं मिली थी। वह जैसे ही घर में घुसने का साहस करता, कोई न कोई आ जाता और उसे वापिस पैर खींचने पङते। कहते हैं सच और भूख को दबाया नहीं जा सकता। लाचार होकर वह घर में घुसा, लेकिन अन्दर घुसते ही वह मार खाकर वापिस भागा। दूसरे घर में घुसा तो एक टांग तुङवा बैठा। चीखता-चिल्लाता वह फिर जंगल की तरफ भागा।

चार दिन तक उसे कुछ नहीं मिला। भूख और पीङा से उसका शरीर आधा रह गया था। वह बेदम-सा होकर एक टीले पर बैठ गया और सोचने लगा, “ऐसे जीवन से तो सौ बार मरना भला! ससुरा ऐह भी कोई जीवन भया! भूखे मरते रहो और अगर किसी हांडी-कुल्हङ में मुँह डालो तो सीधे टांग तुङवाओ! परमात्मा रे परमात्मा! हमको उठा ले रे! …अब और ज्यादा नाहीं जीया जाता…!”
इसी तरह वह काफी देर तक सोच-विचार करता रहा। अन्त में वह उठा और टांग घसीटता हुआ मानव भाई के पास पहुँचा। यहाँ आकर देखा, गर्दभभाई मानव भाई को अपनी आयु दान कर रहा था। यह देख उसे बहुत बल मिला।

अपनी आयु दान कर बिना कुत्ते की ओर ध्यान दिए गर्दभभाई सरपट भाग निकला। इस भय से कि कहीं मानव भाई बुलाकर उसे उसकी दान की हुई आयु वापस न कर दे।

गर्दभभाई के चले जाने के बाद मानव भाई ने कुत्ते की ओर देखा। बङी दयनीय हालत थी। उसकी दुर्दशा देखकर वह मन ही मन बङा प्रसन्न हुआ, परन्तु उपर से अत्यंत हमदर्दी दिखाकर बोला- “यह क्या है कुत्ते भाई? किसने की तुम्हारी यह हालत?”
“ऐह सब तुम्हरी आयु की कृपा है!”
“पर तुम्हारी यह हालत हुई कैसे?”
कुत्ते ने सारी रामकहानी सुनायी। मानव भाई ने दिखावाटी सहानुभूति दिखाते हुए कुत्ते को सांत्वना दी। लेकिन कुत्ता अपनी आयु दान करने का फैसला कर चुका था। बोला- “हम काह करेंगे ससुरी इस आयु का! एक महीने में एक टांग टूटी है, तो चार महीने में चारों! बाकी जिन्दगानी पङे-पङे….!” कहकर कुत्ता रोने लगा।
मानव भाई उसे ढाढ़स बंधाते हुए कहने लगा- “निराश मत होओ भाई! अभी तो बहुत लम्बी उम्र पङी है।”
“नाहीं मनुआ भाई, हम यह उम्र नाहीं झेल सकेवा। हम तो आपको ही दान करेवा।”
मानव भाई दिखावाटी ना-नुकर करने लगा, मगर इस भय से कि कहीं कुत्ते का मन न बदल जाये, उसने ज्यादा आनाकानी नहीं की और सहर्ष बीस वर्ष की आयु लेकर अपनी आयु अस्सी वर्ष कर ली।

चार महीने बीत गए।
एक दिन मानव भाई जंगल में लकङियाँ काट रहा था कि वहाँ गिद्ध भाई का आगमन हुआ। बङी दयनीय हालत थी। शरीर अत्यंत कमजोर व जर्जर हो चुका था। गर्दन बाहर को निकल आई थी। आँखें अन्दर धँस चुकी थी। शरीर के लेशमात्र भार से ही उसकी टांगे कांप रही थी।
इसी शुभ दिन के इंतजार में तो बैठा था मानव भाई। देखकर फूला नहीं समाया। बोला- “यार गिद्ध भाई! आयु क्या मिली, तुम तो किनारा ही कर गए!”
गिद्ध भाई अपनी लम्बी गर्दन तानकर कठिनाई से बोला- “क्यों जले हुए पर नमक छिङक रहे हो भाई!”
“अब क्या कहूँ, जब खुद पर बीतेगी तो आप ही मालूम हो जायेगा। खैर, मैं तुम्हें अपनी आयु दान करने आया हूँ। मेरी प्रार्थना है, इसे अस्वीकार मत करना।
“अरे नही नहीं, मेरे पास पहले से ही बहुत आयु है। मैं क्या करूँगा इतनी आयु का?”
“मना मत करो भाई! बङी उम्मीद लेकर तुम्हारे पास आया हूँ! मुझे बचा लो मेरे भाई!”- कहकर गिद्ध भाई ब्रह्माजी को साक्षी देकर अपनी आयु दान कर बैठा।
मानव भाई ऐसा खुश हुआ मानो उसे नौ निधियों का सुख मिल गया हो। उसकी आयु अस्सी से बढ़कर सौ वर्ष हो गयी थी। वह अपनी खुशी को समेट पाने में भी असमर्थ था।

मानव भाई ने विधि के विधान से प्राप्त बीस वर्ष की आयु पूर्ण कर इक्कीसवें वर्ष में प्रवेश किया। उसकी शादी हो गयी और वह सब-कुछ भूलकर प्रेम के सागर में डूब गया। थोङे समय बाद जब उसके बाल-बच्चे हो गए, तो वह कमाने लगा। ज्यों-ज्यों परिवार बढ़ता गया, आवश्यकताऐं भी बढ़ती गई। चूँकि वह एक जिम्मेदार गृहस्वामी था अतः घर के प्रत्येक सदस्य को खुश रखना अपना कर्त्तव्य समझता था। पत्नी व बच्चों की खुशी के लिए वह खूब मेहनत करता और रोज उन्हें नई-नई चीजें लाकर देता। उसने एक सुन्दर-सा घर भी बनवा लिया था। कुल मिलाकर उसकी गृहस्थी जम गई और घर में चारों तरफ खुशियाँ छा गई। इस प्रकार मानव भाई ने हँसी-खुशी के साथ चालीस वर्ष की आयु पूर्ण कर ली।
अब शुरु हुई गधे द्वारा दान की हुई आयु। गधे का स्वभाव होता है रुखे-सूखे की परवाह किए बिना हाङतोङ मेहनत करना।
अब चूँकि मानव भाई के बाल-बच्चे बङे हो चुके थे अतः वह उनके ब्याह के लिए दौङ-धूप करने लगा। घर को विकसित करने तथा बढ़ती हुई जरूरतों को पूरा करने के लिए रात-दिन मेहनत करने लगा। पहले जहाँ वह खाने-पीने और मौज-मस्ती में ही सारी कमाई उङा देता था, वहीं अब पाई-पाई जोङने लगा। उसकी संचय की प्रवृति बढ़ गई थी और स्वभाव में काफी हद तक लालच भी आ गया था। वह भूख-प्यास की परवाह किए बिना रात-दिन गधे की तरह परिश्रम करने लगा। नतीजा यह हुआ कि बच्चों का विवाह तो हो गया, लेकिन मानव भाई की शारीरिक शक्ति क्षीण होने लगी और वह बूढा दिखाई देने लगा। इस प्रकार मानव भाई ने साठ वर्ष की आयु पूर्ण की।

अब शुरु हुई कुत्ते द्वारा दान की हुई आयु। कुत्ता चापलूस स्वभाव का प्राणी होता है। उसका काम होता है घर की रखवाली करना। भोजन के वक्त वह घर के सदस्यों की तरफ आशा भरी निगाहों से ताकता रहता है। मानव भाई के साथ भी यही हुआ। घर में अब बेटे-बहुओं का अधिकार हो गया था। पहले जहाँ उसकी सलाह के बिना घर का कोई काम न होता था, वहीं अब उसे कोई पूछना भी जरुरी नहीं समझता था। बङे लङके ने आँगन के हटकर एक झौंपङी बना दी थी, वही अब मानव भाई की दुनिया थी। दिनभर वह बैठा-बैठा कुत्ते की तरह घर की रखवाली करता रहता। बहुओं को उसका ठाले बैठे रहना कतई पसंद नहीं था। वे उसे खूब ताने देती और कभी-कभी तो झगङा तक करने पर उतारू हो जाती।
लङके भी कम नहीं थे। उसे हमेशा किसी न किसी काम में जोते रखते। स्वार्थी मानव भाई को अब ज्ञान हुआ कि आयु ग्रहण कर उसने बहुत बङी गलती की। अगर उस समय ज्यादा आयु का लालच नहीं किया होता तो आज ये दिन नहीं देखने पङते। इस प्रकार मानव भाई ने कुत्ते से भी बदतर जिन्दगी जीते हुए अस्सी वर्ष की आयु पूर्ण की।

अब शुरु हुई गिद्ध द्वारा दान की हुई आयु। कहते हैं गिद्ध का बुढ़ापा बहुत भयंकर होता है। उसके चोंच, पंजे, कान तथा आँखें काम करना बन्द कर देते हैं। अब चूँकि मानव भाई भी गिद्ध की ही जिन्दगी जी रहा था अतः उसकी गिद्ध जैसी दुर्दशा होना लाजिमी था और यही हुआ। उसकी हालत अत्यन्त शोचनीय हो गई। आँखें अन्दर धँस गई, गाल पिचक गए, शरीर हड्डियों के ढ़ाँचे में तब्दील हो गया, सुनना बन्द हो गया तथा गर्दन लम्बी होकर गिद्ध की तरह बाहर निकल आयी थी। खटिया पर पङा-पङा वह दिनभर अपने आपको कोसता रहता और बार-बार भगवान से अपनी मृत्यु की प्रार्थना करता रहता। भोजन का वक्त होने पर घुटनों के बल बैठ जाता और गिद्ध की तरह गर्दन निकाल-निकालकर आँगन की ओर ताकने लगता।

अन्त में मानव भाई की जो दुर्दशा हुई, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उसका बुढ़ापा गिद्ध से भी कहीं भयंकर बीता और एक दिन ऐसा आया, जब मानव भाई अपने ही लालच और स्वार्थ के कालकुण्ड में समा गया। कितनी भयंकर थी यह स्वार्थी मौत!

लेखक : मेघराज रोहलण ‘मुंशी’

मोह (लघुकथा)

शर्माजी हाॅकी के स्टार खिलाङी थे। भारत की ओर से खेलते हुए उन्होंने कई राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार व मेडल जीते और देश का नाम रोशन किया। लेकिन जबसे उन्होने खेल से संन्यास लिया है, वे तंगहाली में ही जी रहे हैं।

जब खेलते थे तो लोग उनके आगे-पीछे घूमते थे मगर आज उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है; सरकार भी नहीं। गरीबी और तंगहाली में जी रहे शर्माजी कई बार सुनार की दुकान तक गए अपने मेडल बेचने पर हर बार यही सोचकर वापिस मुङ गऐ कि जब ये मेडल ही नहीं रहेंगे तो उनकी गौरव-गाथा को कौन बयां करेगा? हर बार इसी मोह के कारण उन्होने अपना इरादा बदल लिया।

लेकिन आज उनका मन विद्रोह कर बैठा। घर में खाने को एक दाना तक नहीं और मैं अपनी गौरव-गाथा के मोह में पङा हूँ। अरे भाई.! जीवन नहीं रहेगा तो ये मेडल और गौरव किस काम के? और सारी मोह-माया से नाता तोङकर उन्होनें अपने मेडल बेच डाले।

आज वे पूरी तरह से मोह-माया से मुक्त हो चुके थे।

द्वाराः मेघराज रोहलण ‘मुंशी’

सभ्य दिखने के तौर-तरीके (हास्य-व्यंग्य)

जहाँ तक सभ्य लोगों के बारे में मेरी जानकारी का सवाल है, मैंने दो प्रकार के सभ्य लोग देखे हैं। एक तो अंदरुनी सभ्य, जो उत्तम चारित्रिक गुणों से युक्त होते हैं तथा अपनी सारी सभ्यता अन्दर छुपाकर रखते हैं, परन्तु फिर भी वह प्रकट हो जाती है। और दूसरे होते हैं- बाह्य सभ्य, जो सिर्फ बाहर से सभ्य होते हैं। इनके पास जो सभ्यता होती है, वह सब की सब बाहर दिखती है। ये लोग सभ्यता को प्रदर्शन की वस्तु समझते हैं, न कि अन्दर छुपाकर रखने की। ‘बाह्य सभ्यता’ कतिपय साधनों की सहायता से आसानी से प्राप्त की जा सकती है अतः यह सरल व आकर्षक भी है, फलस्वरुप इस सभ्यता वाले लोगों की संख्या ज्यादा है।

अपने यहाँ जो व्यक्ति शक्ल-सूरत का अच्छा हो, साफ-सुथरे कपङे पहने हो और उल्टी-सीधी ही सही, थोङी बहुत अंग्रेजी बोल लेता हो, उसे सभ्य मान लिया जाता है। भले ही उसे नाक पौंछने की भी सोधी न हो। और अपने मास्टर सभ्यताराम जी तो ‘बाह्य सभ्यता’ के कट्टर समर्थक हैं, जो इसी शहर में अपनी स्वंय की पाठशाला चलाते हैँ।

एक दिन उन्होनें अखबार में एक विज्ञापन छपवाया कि उनके विद्यालय को हिन्दी पढाने वाले दो अध्यापकों की शीघ्र आवश्यकता है। एक परम मित्र की सलाह मानकर मैं भी उनके विद्यालय जा पहुँचा। एक बूढा चपरासी, जो बरामदे में बैठा अपनी
कमजोर आँखों से अखबार पढने की कोशिश कर रहा था, ने मुझे देखते ही नमस्ते की और लपककर अपने बॉस से मेरे अन्दर जाने का हुक्म ले आया।

मैं अन्दर दाखिल हुआ, तो श्रीमान सभ्यताराम जी ने एक पैनी नजर से मेरा मुआयना किया, तत्पश्चात मुस्कुराकर हाथ मिलाया और बैठने का संकेत किया। मेरे बैठते ही वे बोले- “आपका परिचय?”
मैंने अपना परिचय दिया।
वे बोले- “जी कहिए, किससे मिलना है?” शायद उन्होनें मुझे किसी बच्चे का अभिभावक समझ लिया था।
मैंने कहा- “जी आपसे ही मिलना है। दरअसल आज अखबार में विज्ञापन देखकर ज्ञात हुआ कि आपको हिन्दी पढाने के लिए अध्यापक चाहिए…!” – यह सुनते ही उन्होनें मुझे ऐसे देखा, मानो हम दुनिया के आठवें अजूबे हों।
फिर चेहरे पर तनिक मुस्कान पोतकर बोले- “अच्छा-अच्छा! हाँ, हमें दो हिन्दी-टीचर्स की सख्त जरुरत है।”

तत्पश्चात योग्यता, तनख्वाह, विद्यालय के नियम-कायदे और अनुशासन जैसे विषयों पर कई देर बातचित हुई और अन्त में वे एक आदेश-सा देते हुए बोले- “आपको अपनी वेशभूषा में भी थोङा बदलाव करना होगा। एक टीचर को ऐसी वेशभूषा शोभा नहीं देती।”

वेशभूषा पर की गई उनकी यह टिप्पणी मुझे बङी बचकानी लगी। मैं कोई नंगा तो आया नहीं।
अच्छे-भले कपङे पहने हूँ, फिर भी….?
मैंने पूछा- “वेशभूषा में बदलाव से आपका क्या मतलब है?”
वे बोले- “आपको क्लीन एण्ड प्रेस्ड ड्रेस में आना होगा। परफ्यूम वगैरह डालकर आओ, तो और भी अच्छी बात है, बदबू नहीं आएगी। प्रजेंट टाईम में आप जिस तरह शर्ट बाहर लटकाए घूम रहे हैं, यह बिल्कुल नहीं चलेगा। शर्ट अन्दर दबाकर तथा बेल्ट बांधकर आना होगा। ये स्लीपर-सैण्डिल वगैरह भी नहीं चलेंगी, शूज पहनकर आना होगा। और वो भी यूँ नहीं कि कैसे भी पैरों में फंसाकर चले आओ, पॉलिश किये हुए होने चाहिए…बिल्कुल चमचमाते! (फिर मेरे सिर की तरफ देखकर) और आप जो ये लम्बी-लम्बी जटाऐं बढाकर घूम रहे हैं, इन्हें कटवाकर आना होगा। बालों ऐसा फ़ैशन गुण्डे-बदमाशों को शोभा देता है। बालों में अच्छी क्वालिटी का ऑयल डालकर तथा ढंग से कंघी करके आना होगा। चूँकि आप एक हिन्दी-टीचर हैं अतः हम आप पर प्रेशर तो नहीं डालेंगे, लेकिन फिर भी आपको बातचित के दौरान अधिकाधिक इंगलिश का यूज करना चाहिए। स्कूल में सबके साथ अच्छा बीहेव करना होगा। अपने सीनियर्स की रिस्पेक्ट करनी होगी। सौ बातों की एक बात कि आपको हैंड्रेड परसेंट एक सभ्य व्यक्ति की तरह पेश आना होगा।”

उनका यह कर्णकटु भाषण सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया। मैं बोला- “आपने जो तनख्वाह बताई है, वह तो सारी इस तामझाम की भेंट चढ जायेगी, फिर मैं खाऊंगा क्या?…धक्के?”

यह सुनकर वे खासे नाराज हो गये। बोले- “ऐसी लैंग्वेज सङकछाप बल्लमटेरों को शोभा देती है। टीचर बनने चले हैं, तनिक बोलने का नॉलेज है कि नहीं?”
मैं बोला- “जब आपने सभ्य बनने के सारे तौर-तरीके सिखा दिये हैं, तो कृपा करके बोलने का नॉलेज और सिखा दीजिए।”
वे चिढ़कर बोले- “मुझे पहली नजर में ही मालूम हो गया था कि ‘तुम’ एकदम उज्जङ व गंवार आदमी हो, और अन्त में वही साबित हुए।”
मैंने सहजता से कहा- “अगर हम उज्जङ और गंवार हैं, तो वैसे ही दिखते भी हैं। अपने उज्जङपन को ढंकने के लिए कम से कम सभ्यता का लबादा तो नहीं ओढ़ते?”
वे तिलमिलाकर बोले- “अच्छा ठीक है, अब यह बकवास बन्द करो और अपनी राह लो। तुम्हारे जैसे बदज़ुबान लोगों को तो मैं पिऑन तक नहीं रखता।….ईडियट!”
पास में बैठा लिपिक, जो कई से हमारी बातें सुन रहा था, बोला- “आप भी बॉस! एक सुसभ्य व्यक्ति होकर इस मूर्ख से क्यों मुँहजोरी कर रहे हैं?”

अब कोई कहाँ तक सब्र करे।
मैंने कहा- “शेर की खाल ओढ लेने मात्र से भेङिया शेर नहीं बन जाता, वह भेङिया ही रहता है। हाँ, देखने वालों को उसके शेर होने का भ्रम ज़रूर बना रहता है। और यही कहानी इस सभ्यता की खाल की है, जो आप लोगों ने ओढ रखी है।
आपके अनुसार साफ-सुथरे और इस्तरी किये हुए कपङे पहनने वाला व्यक्ति सभ्य है, तो महात्मा गाँधी को आप क्या कहेंगे? सूरदास, तुलसीदास और गौतम बुद्ध को क्या कहेंगे? मूर्ख? उज्जङ? गंवार? ईडियट? लम्बे बाल रखने वाले व्यक्ति आपकी नज़र में गुण्डे-बदमाश हैं, तो अल्बर्ट आईन्सटीन, गैलीलियो, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, सुमित्रानन्दन पंत तथा डॉक्टर ए. पी. जे.
अब्दुल कलाम जैसे लोग तो आपके अनुसार सबसे बङे बदमाश होने चाहिये। चमचमाते शूज न पहनने वाला व्यक्ति भी आपकी नज़र में कम मूर्ख नहीं है, फिर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को आप क्या कहेंगे, जो लकङी के खङाऊ पहनते थे और उनको भी भरत ने लाकर अयोध्या के सिंहासन पर रख दिया था। अकेले राम ही क्यों? उस जमाने में तो सब खङाऊ ही पहनते थे या फिर नंगे पाँव घूमते थे। हाँ, माना अब वह जमाना नहीं रहा, लेकिन आज भी भारत की कुल आबादी की लगभग एक चौथाई जनता ऐसे हालातों में जी रही है कि चप्पलों की तो कौन कहे, एक जून की रोटी तक नसीब नहीं होती। आप कहते हैं कि परफ्यूम लगाने से भी आदमी अच्छा-खासा सभ्य दिखता है और तन से बदबू भी नहीं आती, पर जनाब! जो आदमी रोज नहाता-धोता हो, उसे ईत्र-सुगन्ध की क्या जरुरत है? उसके तन से तो यों ही बदबू नहीं आएगी। और तो और………..।”

“अबे चुप कर स्साले…! बहुत हो गई तेरी बकवास!”- लगभग चीखते हुए श्रीमान सभ्यताराम जी ने मुझे बीच में ही रोक दिया।

हम पुनः बोलने को उद्यत हुए ही थे कि दो अति सुसभ्य महानुभावों ने आकर हमें कंधों से पकङा और लगभग घसीटते हुए पाठशाला के बाहर का रास्ता दिखा दिया।

लेखक : मेघराज रोहलण ‘मुंशी’

सरोगेट मदर (लघुकथा)

नेहा ने काॅलेज के दिनों से ही ड्रग्स लेना शुरू कर दिया था। पहले तो शौक-शौक में चोरी-छिपे थोङा-बहुत लेती थी लेकिन धीरे-धीरे यही शौक लत में बदल गया और डोज दुगुना… तिगुना… चौगुना हो गया। चिर-परिचितों का बहुत-सा उधार हो गया। धीरे-धीरे सारे चिर-परिचित और यार-दोस्त भी उससे कन्नी काटने लगे। अब हालात यहाँ तक आ पहुँचे कि वह नशे के लिए कुछ भी करने को तैयार थी।

आज शाम को जब नशे की तलब लगी तो चारों ओर से निराश व मजबूर होकर वह आत्महत्या करने चल दी। तभी काॅलेज की एक सहेली प्रिया मिल गई, जो खुद नशे की आदी थी। नेहा और प्रिया ने एक साथ ड्रग्स लेना शुरू किया था। प्रिया काफी खुश नजर आ रही थी।
बातों बातों में प्रिया ने पूछा, “और सुना, क्या चल रहा है आजकल?”
“मत पूछ, बस मरने जा रही थी कि तू मिल गई। अपनी तो जिंदगी नरक है। पर यार तेरे तो बङे ठाठ हैं, क्या बात है?”
“ऐसे ठाठ तो किसी भी लङकी के हो सकते हैं।”
“वह कैसे?” – नेहा ने उत्सुकता से पूछा।

प्रिया ने उसे अपनी कोख किराये पर देकर मुँहमांगी रकम पाने का फाॅर्मूला बताया तो नेहा की बाछें खिल उठी। एक क्षण में पूरा कार्यक्रम तय हो गया।

“पापा, मैं स्पेशल ट्रेनिंग के लिए दिल्ली जा रही हूँ। पूरे एक साल बाद लौटूंगी।” – कहकर नेहा ने घरवालों से विदा ली और निकल पङी… सरोगेट मदर बनने।

लेखक : मेघराज रोहलण ‘मुंशी’